कल तक
खुद ही खुद से
लड़ती थी मैं।
स्वार्थ से भरी दुनिया मैं
ढूँढती थी अपनापन....
कल तक
कुछ पाने की अदम्य चाह लिए
हर टकराव को झेला मैंने
अकेले ही...
कल तक,
मैं सिर्फ मैं थी
जिन्दगी से जूझने और
अकेले मैं खुद से संवाद करने के लिए।
पर आज,
मुझसे टकराने से पहले तूफ़ान को
मेरी चट्टान से टकराना होगा
पर आज,
"मैं'' पिघलकर ''हम'' हो गया है
उसकी सांसो की महक मुझमें
असीमित उर्जा भारती है
पर आज,
मैं खिलखिलाकर कहती हूँ
मुझे मेरा प्यार मिल गया है......
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